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हिन्दी का मध्यम वर्ग ही इस भाषा का सबसे बड़ा गद्दार है : राहुल देव

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नयी दिल्ली. प्रति वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है. इस दौरान विभिन्न सरकारी आयोजनों के बावजूद हिन्दी के भविष्य को लेकर तमाम आशंकाएं उठती रहती हैं. पेश हैं हिन्दी की दशा-दिशा के बारे में वरिष्ठ पत्रकार तथा संसद के तहत स्पीकर्स रिसर्च इनीशिएटिव (एसआरई) के मानद् सलाहकार राहुल देव से ‘भाषा’ के पांच प्रश्न और उनके उत्तर :

प्रश्न : हिन्दी की वर्तमान दशा से आप कितने सन्तुष्ट हैं?

उत्तर : घोर असन्तुष्ट हूं. हिन्दी की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ रही है. जिन्दगी के जितने महत्वपूर्ण सन्दर्भों में भाषा का प्रयोग होता है, उन सभी सन्दर्भों में हिन्दी का प्रयोग घट रहा है. प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा में, विश्वविद्यालयों में, मौलिक चिन्तन-लेखन और विमर्श के सभी क्षेत्रों में, ज्ञान में, प्रशासन में, नयी पीढ़ी के शब्दकोश और शब्द व्यवहार में हिन्दी तथा सभी भारतीय भाषाएं पिछड़ रही हैं.

प्रश्न : इंटरनेट के युग में हिन्दी के सामर्थ्य और प्रयोग को किस प्रकार बढ़ाया जाए और इसका मानकीकरण कैसे हो ताकि रोमन लिपि में हिन्दी लिखने का चलन कम हो सके?

उत्तर : हिन्दी या दुनिया की कोई भी भाषा हो, उसके प्रयोग और समझ का एक ही तरीका है कि उसके प्रयोग को बढ़ाया जाए. प्रौद्योगिकी, आईटी में हिन्दी का जितना प्रयोग बढ़ेगा, हिन्दी उतनी ही बढ़ेगी. जब हिन्दी का प्रयोग ज्ञान और व्यवहार के उच्चतर क्षेत्रों में होने लगेगा तो हिन्दी की सामर्थ्य अपने आप बढ़ जाएगी. रोमन लिपि में लिखी हिन्दी अपाहिज हिन्दी है. दिक्कत यह है हमारी नयी पीढ़ी के सामने कंप्यूटर या मोबाइल पर टाइंिपग के लिए जो कीबोर्ड या कुंजीपटल सबसे पहले सामने आता है, वह अंग्रेजी का होता है. कई लोगों को तो यह तक नहीं मालूम होता कि हिन्दी में भी कुंजीपटल होता है.

प्रश्न : हिन्दी आज तक राजकाज की भाषा क्यों नहीं बन पाई?

उत्तर : हिन्दी क्षेत्रों से आये अधिकतर लोग पहले ही अंग्रेजी के आगे समर्पण कर चुके होते हैं. अंग्रेजी से लड़ने की उनमें ताकत नहीं है. नैतिक या आत्मबल नहीं है. अच्छी भाषा अच्छा पढ़ने से आती है. जब आप राजनय विषयों के बारे में हिन्दी में पढ़ेंगे, उनके शब्दों एवं प्रत्ययों से परिचित होंगे तभी तो आप राजनय विषयों पर हिन्दी में प्रभावी ढंग से बोल पाएंगे. लोगों को लगता है कि ज्ञान के जितने क्षेत्र हैं, उनके बारे में अंग्रेजी में ही पढ़ लो. कुल मिलाकर लोगों के मन में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग केवल हल्की फुल्की बात करने, कहानी-कविता आदि साहित्य लिखने के लिए ही होता है. उन्हें लगता है कि हिन्दी विज्ञान, कानून, अर्थशास्त्र, राजनय आदि के लिए उपयुक्त नहीं है. हिन्दी में अधिक प्रयोग नहीं हो रहा, इसलिए वह लोगों तक नहीं पहुंच पा रही और लोगों की पहुंच अंग्रेजी में ही कैद बनी हुई है.

प्रश्न : हिन्दी का सामर्थ्य बढ़ाने में बाजार की भूमिका क्या हो सकती है?

उत्तर : बाजार की भूमिका बहुत सीमित रहती है. बाजार अपने ग्राहकों की इच्छा एवं व्यवहार से चलता है. बाजार किसी भाषा की तथाकथित महानता से प्रभावित होकर उसे नहीं चलाता है. बाजार यदि बहुत छोटे स्तर पर हिन्दी को अपनाते दिख रहा है तो उसका कारण ग्राहकों की संख्या है. बड़े शहरों के अंग्रेजी पढ़े लिखे तबकों में अब बाजार के लिए बहुत कम संभावनाएं बच गयी हैं. बाजार को चाहिए नये ग्राहक और उपभोक्ता, जो दूसरी श्रेणी के शहरों एवं कस्बों में हैं. शुद्ध लाभ कमाने के मकसद से ग्राहकों तक पहुंचने के लिए वे उनकी भाषा का उपयोग कर रहे हैं. उनको भाषा से कोई प्रेम नहीं है. यह सोचना ही मूखर्ता है कि भाषा के विकास में बाजार कोई भूमिका निभाएगा. किसी भी भाषा की शक्ति को बढ़ाने का सबसे बड़ा कारक यह देखना होता है कि उसे बोलने वाले व्यक्तियों के मन में भाषा के प्रति भाव क्या है.

प्रश्न : भारत में पढ़े-लिखे तबके की सोच की भाषा हिन्दी क्यों नहीं है?

उत्तर : अंग्रेजी में पढ़ा-लिखा तबका उस भाषा का बौद्धिक गुलाम है. उसे अपनी गुलामी पर गर्व है, शर्म नहीं. हिन्दी का मध्यम वर्ग ही हिन्दी का गद्दार है. यही असली सच है, जिसे आप भी महसूस करते होंगे. दूसरी भाषाओं में यह स्थिति नहीं है. एक औसत मराठी, बांग्ला, तमिल या कन्नड़ भाषी हमारी तुलना में अपनी भाषा से गहराई से जुड़ा है. साथ ही वह हमसे बेहतर अंग्रेजी भी जानता है. आखिर यह हमारे यहां क्यों नहीं हो सकता. देखा जाए तो हिन्दी समाज एक लज्जित समाज है. उसको हिन्दीवाला होने पर शर्म आती है.

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