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महिलाओं के बीएसएफ में भर्ती होने के पीछे वित्तीय सुरक्षा मुख्य वजह

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नयी दिल्ली. देश के सबसे बड़े सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ में सुरक्षार्किमयों के दल में महिलाओं की भर्ती के पीछे मुख्य वजह देश की सेवा करने की इच्छा के बजाय वित्तीय सुरक्षा है.

बीएसएफ अधिकारी के. गणेश द्वारा किए अध्ययन में यह सामने आया है. अध्ययन में यह भी पाया गया कि सीमा रक्षा बल के साथ काम कर रही महिलाओं में से अधिकांश ने कभी कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न की बड़ी घटनाओं का सामना नहीं किया. किसी भी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में लड़ाकू भूमिकाओं में महिलाओं के सामने आने वाले मुद्दे को समझने के लिए यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है.

पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरडी) की ताजा पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर महिला कांस्टेबलों को महिला डॉक्टर मुहैया नहीं करायी जाती, उन्हें माहवारी के दौरान पर्याप्त आराम नहीं दिया जाता और पुरुष सहर्किमयों द्वारा अक्सर बोलचाल में दी जाने वाली गालियों से उन्हें बुरा लगता है.

सीमा सुरक्षा बल के करीब 2.65 लाख कर्मी देश की दो महत्वपूर्ण सीमाओं पाकिस्तान और बांग्लादेश की रक्षा करते हैं. इसके अलावा उन्हें आतंकवाद रोधी और नक्सल रोधी अभियानों में भी तैनात किया जाता है.

इस अध्ययन का विश्लेषण पीटीआई-भाषा ने भी किया है. अध्ययन में कहा गया है, ‘‘बीएसएफ को बतौर करियर चुनने वाली इन महिलाओं के लिए मुख्य वजह वित्तीय सुरक्षा दिखाई देती है. 80 फीसदी से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि उनके लिए सुरक्षा बल में शामिल होने की वजह रोजगार या वित्तीय कारण हैं.’’

इसमें कहा गया है, ‘‘55 में से केवल 11 महिलाओं ने कहा कि वे देश की रक्षा करने के लिए इस सेवा में हैं.’’ अध्ययन के अनुसार, 50 फीसदी से अधिक महिलाओं ने कहा कि वे 20 साल से कम समय में सेवा से इस्तीफा दे देंगी और केवल 18 फीसदी सेवानिवृत्ति तक काम करना चाहती हैं.

इसमें कहा गया है, ‘‘ज्यादातर महिलाओं का मानना है कि बीएसएफ का हिस्सा बनने के कारण समुदाय में उनका दर्जा बढ़ गया है.’’ इस अध्ययन के लिए विभिन्न सीमा इकाइयों में तैनात कुल 55 महिला र्किमयों से नौकरी को लेकर संतुष्टि, यौन उत्पीड़न, ंिलग आधारित भेदभाव और तनाव तथा उन्हें प्रेरित करने वाले विषयों पर उनका जवाब मांगा गया.

इसमें बीएसएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) जैसे सीमा रक्षा बलों में महिला र्किमयों की संख्या 15 फीसदी तक बढ़ाने वाले सरकार के हालिया निर्देश को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. अध्ययन में कहा गया है, ‘‘महिला र्किमयों की मौजूदा संख्या बीएसएफ में करीब 3,500 है और अगर इसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाया गया तो कुल संख्या 30,000 के करीब होगी.’’

इसमें कहा गया है कि संगठन के लिए दिक्कत यह है कि जब महिलाओं की संख्या 15 प्रतिशत तक बढ़ाई जाएगी तो कैसे संचालनात्मक कुशलता को बरकरार रखा जाएगा क्योंकि उन्हें केवल आसान नौकरियां ही देनी पड़ेंगी. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित मुद्दों पर 54 र्किमयों ने कहा कि उन्होंने कभी यौन उत्पीड़न का सामना नहीं किया. वहीं, चार महिलाओं ने कहा कि उन्होंने अनुचित शारीरिक संपर्क और उन पर किए यौनिक प्रकृति के मजाक का सामना किया है.

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