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मारिया के खुलासे पर भाजपा का सवाल : क्या भगवा आतंकवाद साजिश कांग्रेस व ISI की संयुक्त योजना थी

नयी दिल्ली/मुंबई. भाजपा ने मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की नयी किताब में किए गए दावे को लेकर मंगलवार को कांग्रेस पर हमला बोला और कहा कि इससे सवाल पैदा होता है कि क्या ‘‘भगवा आतंकवाद की साजिश कांग्रेस और पाकिस्तानी आईएसआई की संयुक्त योजना थी.’’

मारिया ने अपनी किताब में दावा किया है कि लश्कर-ए-तैयबा ने 26/11 के आतंकी हमले को ंिहदू आतंकवाद के रूप में पेश करने की योजना बनाई थी. मारिया के संस्मरण ‘लेट मी से इट नाउ’ का  सोमवार को लोकार्पण हुआ. मारिया ने 26/11 के आतंकी हमले की जांच की थी. उन्होंने यह दावा भी किया कि पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल कसाब को बेंगलुरु के समीर चौधरी के रूप में मरना था.

भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने मारिया के दावे पर कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस्लामिक आतंकवाद के इतिहास में पहली बार अपराधियों ने अपनी पहचान के बारे में लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया.

उन्होंने कहा, “यह गंभीर सवाल उठाता है, क्या भगवा आतंकवाद की साजिश कांग्रेस और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की संयुक्त योजना थी. लगभग उसी समय, संप्रग ने भगवा आतंकवाद की बात की और राहुल गांधी ने अमेरिकी राजनयिकों से कहा कि भारत में पैदा हुए समूह इस्लामिक आतंकी समूह की अपेक्षा बड़ा खतरा हैं.’’  

उन्होंने कांग्रेस से जवाब मांगते हुए कहा कि पार्टी को इस पर सफाई देनी चाहिए और स्पष्ट करना चाहिए कि क्या आईएसआई कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग का विस्तारित हिस्सा थी.

लश्कर की योजना मुंबई हमले को हिंदू आतंकवाद के तौर पर पेश करने की थी : मारिया
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया ने दावा किया है कि लश्कर-ए-तैयबा ने 26/11 के मुंबई आतंकी हमले को “ंिहदू आतंकवाद” के रूप में पेश करने तथा पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल कसाब को बेंगलुरु के समीर चौधरी के रूप में मारे जाने की योजना बनाई थी.

मारिया ने सोमवार को जारी अपने संस्मरण ‘‘लेट मी से इट नाउ’’ में 26/11 के मुंबई हमले में उनके द्वारा की गई जांच का जिक्र किया. उस हमले की योजना लश्कर ने बनाई थी और उसमें पाकिस्तान का हाथ भी होने का पता चला था. पुस्तक के अंशों के अनुसार, (पाकिस्तानी) आईएसआई और लश्कर जेल में ही कसाब को खत्म करने का प्रयास कर रहे थे क्योंकि वह हमले की कड़ी उन समूहों से जोड़ने वाले प्रमुख सबूत था और दाऊद इब्राहिम के गिरोह को उसे खत्म करने का जिम्मा सौंपा गया था.

मुंबई आतंकी हमले को “ंिहदू आतंकवाद” के रूप में पेश करने की लश्कर की योजना का ब्यौरा देते हुए मारिया ने लिखा, “यदि सब कुछ योजना के अनुसार होता, तो कसाब चौधरी के रूप में मर जाता और मीडिया हमले के लिए ‘ंिहदू आतंकवादियों’ को दोषी ठहराती.’’ उन्होंने दावा किया कहा कि आतंकवादी संगठन ने आतंकवादियों को भारतीय पते के साथ फर्जी पहचान पत्र भी दिए थे.

आतंकी हमले के बाद जारी की गयी कसाब की एक तस्वीर के बारे में मारिया ने कहा, “यह केंद्रीय एजेंसियों का काम था. सुरक्षा को देखते हुए मुंबई पुलिस ने पूरी कोशिश की कि मीडिया के सामने किसी विवरण का खुलासा नहीं हो.’’ तस्वीर में कसाब की दाहिनी कलाई पर लाल रंग का धागा बंधा हुआ था जिसे पवित्र ंिहदू धागा माना जाता है. इस बात ने कई लोगों को यह भरोसा करने के लिए प्रेरित किया कि षडयंत्रकारियों ने 26/11 हमले को ‘ंिहदू आतंकवाद’ के रूप में पेश करने का प्रयास किया था.

मारिया ने अपनी किताब में लिखा, ‘‘अखबारों में बड़ी बड़ी सुर्खियां बनतीं जिनमें दावा किया जाता कि किस प्रकार ंिहदू आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया. शीर्ष टीवी पत्रकार उसके परिवार और पड़ोसियों से बातचीत करने के लिए बेंगलुरु पहुंच जाते. लेकिन अफसोस, ऐसा नहीं हो सका वह पाकिस्तान में फरीदकोट का अजमल आमिर कसाब था.’’ उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई के कांस्टेबल शहीद तुकाराम ओम्बले द्वारा कसाब को ंिजदा पकड़ लेने से वह योजना नाकाम हो गयी.

पुस्तक के अनुसार कसाब लूटपाट के लिए लश्कर में शामिल हुआ था और उसका जिहाद से कोई लेना-देना नहीं था. हालांकि ऐसी शिक्षा दी गयी थी ताकि कसाब को विश्वास हो कि भारत में मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं है. मारिया ने पुस्तक में उल्लेख किया कि जब कसाब को मेट्रो सिनेमा के पास एक मस्जिद की यात्रा करायी गयी जो वह चौंक गया.

पूर्व पुलिस अधिकारी के अनुसार, मुंबई पर हमला करने के लिए कसाब को मिशन पर भेजे जाने से पहले एक हफ्ते की छुट्टी और 1.25 लाख रुपये दिए गए थे. कसाब ने वह पैसे अपनी बहन की शादी के लिए अपने परिवार को दिया.

मारिया का दावा: पुलिस के आला अफसर शीना बोरा मामले के आरोपियों को सामाजिक रूप से जानते थे
मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया ने दावा किया है कि उनके बाद इस पद पर रहने वाले अहमद जावेद, शीना बोरा हत्या मामले में आरोपी इंद्राणी और पीटर मुखर्जी को सामाजिक रूप से जानते थे और पीटर तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) देवेन भारती को भी भलीभांति जानते थे.

मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों जैसे हाईप्रोफाइल मामले की जांच करने वाले और 26 नवम्बर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले की जांच का नेतृत्व करने वाले मारिया ने सोमवार को जारी अपनी किताब ‘लेट मी से इट नाउ’ में यह खुलासा किया है. भारती इस समय महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के प्रमुख हैं. भारती ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह पुस्तक के लिए प्रचार की रणनीति प्रतीत होती है.

पीटर मुखर्जी को शीना बोरा हत्या मामले में 19 नवम्बर 2015 को गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में उनकी पूर्व पत्नी इंद्राणी मुखर्जी मुख्य आरोपी है. इंद्राणी मुखर्जी की बेटी शीना बोरा (24) की हत्या का मामला 2015 में उस समय प्रकाश में आया था जब मुखर्जी के चालक श्यामवर राय को एक अन्य मामले में गिरफ्तार किया गया था.

राय ने शीना के शव को ठिकाने लगाने में मदद की थी. बाद में इस मामले में राय सरकारी गवाह बन गया था. मारिया ने पुस्तक में लिखा है कि जावेद भी मुखर्जी को सामाजिक रूप से जानते थे और उन्हें बाद में ईद की पार्टी में आमंत्रित किया गया था. किताब के अनुसार हत्या मामले की जांच के दौरान पीटर मुखर्जी ने मारिया को बताया था कि वह शीना बोरा के लापता होने की शिकायत को लेकर 2012 में देवेन भारती के पास गये थे.

किताब के अनुसार जब शीना के अचानक गायब होने के बारे में पता चलने पर मारिया ने पीटर मुखर्जी से ‘‘कुछ नहीं करने’’ के बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘‘सर, मैंने देवेन को बताया था.’’ मुखर्जी से पूछताछ के बारे में याद करते हुए मारिया ने कहा, ‘‘उस रात मैं एक झपकी भी नहीं ले सका था. मेरे दिमाग में यही चलता रहा कि पीटर ने मुझे शाम को जो बताया था, उसका सही मतलब पता लगाना है.’’

उन्होंने किताब में कहा, ‘‘इसका मतलब था कि पीटर मुखर्जी, देवेन भारती को अच्छी तरह से जानते थे और पहला नाम लेकर बात कर रहे थे. और मैं इन दिनों यह सब नहीं जानता था. इसके अलावा, देवेन भारती ने मुझे एक बार भी यह बताना उचित नहीं समझा कि मुखर्जी उनके करीबी हैं.’’ मारिया ने दावा किया कि जब भी वह भारती से गुमशुदगी की शिकायत दर्ज न करने के रहस्य या दुर्घटनावश मौत की रिपोर्ट पर चर्चा करते तो वह चुप रहते थे.

मारिया ने किताब में लिखा है कि जावेद भी मुखर्जी को ‘‘सामाजिक रूप’’ से जानते थे. उन्होंने लिखा, ‘‘जानबूझकर गलत ढंग से जांच को बदनाम करने का प्रयास किया गया कि मैं मुखर्जी को सामाजिक रूप से जानता था. मैंने स्पष्ट रूप से इसका खंडन किया था, लेकिन संदेह का माहौल बना रहा.’’ बाद में मरिया को महानिदेशक (होमगार्ड) नियुक्त किया गया और जावेद ने मुंबई पुलिस के प्रमुख का पद्भार संभाल लिया.

मारिया ने लिखा, ‘‘मुझे हटाये जाने के एक सप्ताह बाद यह पता चला कि पिछले सीपी नहीं बल्कि नये सीपी (जावेद) मुखर्जी को सामाजिक रूप से जानते थे और उन्होंने अपनी ईद की पार्टी में उन्हें आमंत्रित किया था.’’ मारिया के दावे को खारिज करते हुए भारती ने कहा कि मारिया बॉलीवुड से जुड़े एक परिवार से ताल्लुक रखते हैं और ऐसा लगता है कि पटकथा लेखकों का उन पर काफी प्रभाव है. इसके अलावा, पुस्तक के लिए यह एक विपणन रणनीति प्रतीत होती है. भारती ने कहा कि इसके अलावा , एक पुलिसकर्मी को , ‘‘काल्पनिक कथा’’ के बजाय आरोप पत्र और केस डायरी पढ़ने की सलाह दी जाती है.

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