वैवाहिक बलात्कार पर कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले पर याचिकाकर्ताओं की मिलीजुली प्रतिक्रिया

नयी दिल्ली. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बलात्कार को लेकर कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए मुकदमे से नहीं बच सकता है कि पीड़िता उसकी पत्नी है. इस फैसले के बाद बृहस्पतिवार को उन पक्षकारों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आई, जिन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष वैवाहिक बलात्कार के मुद्दे पर दलील दी है.

भारतीय बलात्कार कानून के तहत पति को दी गई छूट को रद्द करने का अनुरोध करने वाले एक याचिकाकर्ता के वकील ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया. जबकि, एक पुरुष अधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम करता है. हालांकि, कई याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य वकीलों ने यह कहते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में विचारधाीन है.

बलात्कार के अपराध को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 में अपवाद-2 खंड है, जो कहता है कि पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार नहीं है. हालांकि, इसमें यह भी प्रावधान है कि पत्नी की उम्र 15 साल से कम नहीं होनी चाहिए.

दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर विभिन्न याचिकाओं में इस अपवाद को चुनौती दी गई है. दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष गैर सरकारी संगठनों आरआईटी फाउंडेशन और आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमंस एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता राघव अवस्थी ने कहा कि उन्होंने कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूरे फैसले को नहीं पढ़ा है, लेकिन यह एक ‘‘स्वागत योग्य कदम’’ है.

हालांकि, पुरुषों के कल्याण ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व कर रहे अमित लखानी ने कहा कि हाल के दिनों में आईपीसी की धारा 375 से अपवाद को हटाने के लिए एक मजबूत और स्पष्ट जोर दिया गया है. ऐसे में वही बलात्कार कानून अब पति पर लागू होगा, जो उन अपराध को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है जहां अपराधी पति नहीं है.

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि एक व्यक्ति केवल इसलिये दुष्कर्म के मुकदमे से बच नहीं सकता कि पीड़िता उसकी पत्नी है. साथ ही, यह समानता के अधिकार के खिलाफ है. अदालत ने सुझाव दिया कि सांसदों को ‘‘चुप्पी की आवाज’’ सुननी चाहिए और कÞानून में असमानताओं को दूर करना चाहिए.

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