गांव-गांव में बेहिसाब लोगों को कोरोना ने निगल लिया, मंत्रिमंडल ने इस पर चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझा!

हरियाणा. क्‍या हरियाणा सरकार की मानवीय संवेदनाएं खत्‍म हो गई हैं? मंत्रिमंडल की बैठक में कोरोना पर चर्चा तक करना सरकार ने मुनासिब नहीं समझा। गांव-गांव में बेहिसाब लोगों को कोरोना ने निगल लिया, लेकिन शायद वह इतने बदकिस्‍मत थे कि सरकारी रजिस्‍टर में कोरोना से जान गंवाने वालों में उनका नाम तक शुमार नहीं हो पाया। ऐसे परिवारों को उम्‍मीद थी कि मंत्रिमंडल में मंथन के बाद शायद सरकार कोरोना से हुई मौतों की वास्‍तविक तादाद जानने के लिए कोई सर्वे जैसा ऐलान करने की हिम्‍मत दिखाएगी और इस मुश्किल वक्‍त में सरकारी मदद के हकदार लोगों की लिस्‍ट में वह भी शामिल हो पाएंगे। वहीं, फरीदाबाद के खोरी गांव की उजड़ने जा रही 60 हजार की आबादी की मुसीबतों पर भी सरकार मेहरबान नहीं हुई।

चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सरकार के सचिवालय में मंगलवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक के बाद लोगों को उस वक्‍त बेहद मायूसी हुई जब बताया गया कि कोरोना पर मंत्रिमंडल में कोई चर्चा नहीं हुई। न ही अरावली की पहाड़ियों पर बसे करीब 60 हजार की आबादी वाले खोरी गांव के बाशिंदों से सुप्रीम कोर्ट के फरमान के चलते छिनने जा रहे आशियाने के बाद पुनर्वास को लेकर राहत के दो शब्‍द सरकार की तरफ से आए। मंत्रिमंडल ने हरियाणा लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) विनियम 2018 में संशोधन को मंजूरी देने के साथ ही वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी ‘समाधान से विकास’ को 30 सितंबर, 2021 तक बढ़ाने, मोटर वाहन अधिनियम के तहत यातायात अपराधों की कंपोजिशन के लिए कंपाउंडिंग राशि के साथ अधिकारियों को विनिर्दिष्ट करने के संबंध में प्रस्ताव पास करने, प्रदेश में पूरी तरह से निर्मित नए परिवहन वाहनों का पंजीकरण डीलरों के माध्यम से ही करवाने, राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग और जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों के अध्यक्षों और सदस्यों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तों को नियंत्रित करने के लिए हरियाणा उपभोक्ता संरक्षण नियम, 2021 को स्वीकृति देने, मोटर वाहन विभाग के पुनर्गठन के प्रस्ताव को मंजूरी समेत रियल एस्टेट उद्योग के साथ-साथ भूमि उपयोग परिवर्तन (सीएलयू) धारकों / उद्यमियों को दो महीने के लिए राहत प्रदान करने के फैसले लिए। हरियाणा लोक सेवा आयोग (सेवा की शर्तें) विनियम 2018 में संशोधन को भी मंजूरी प्रदान कर दी गई, जिसके बाद अब आयोग के सदस्यों की संख्या अध्यक्ष के अलावा, मौजूदा 8 से घटाकर 5 कर दी गई है। हालांकि, इसे जन नायक जनता पार्टी की उम्‍मीदों पर तुषारापात माना जा रहा है। दुष्‍यंत चौटाला रिक्‍त स्‍थानों की भरपाई के लिए अपने लोगों की नियुक्ति की मांग कर सकते थे, जिसे पद ही समाप्‍त करके खत्‍म कर दिया गया। यहां तक कि महर्षि बाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल के नाम से बाल्‍मीकि की जगह वाल्मीकि करने के प्रस्‍ताव को भी कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। लेकिन सरकार के दिग्‍गज कोरोना की भयावह त्रासदी से जूझ रहे लोगों के असल मसले पर चर्चा के लिए वक्‍त नहीं निकाल पाए। खास तौर पर उन परिवारों को, जिनके घर से किसी की लाश निकली है, उम्‍मीद थी कि सरकार कुछ हिम्‍मत दिखाएगी और कोरोना से हुई मौतों के आंकड़ों को दुरुस्‍त करने के लिए कोई ऐलान करेगी। गांव-गांव कोरोना जैसे लक्षणों वाले ऐसे पीडि़तों की भारी तादाद में मौत हुई है, जिनका कोविड प्रोटोकॉल से अंतिम संस्‍कार तक नहीं हो पाया है। जाहिर है कि ऐसे मृतकों का कोई कोरोना टेस्‍ट न होने के चलते उनकी मौत की वजह कोरोना नहीं मानी गई है। ऐसे परिवार सरकार की किसी मदद के भी हकदार नहीं हैं। मंत्रिमंडल की बैठक से उम्‍मीदें संजोए इन परिवारों की उम्‍मीदें ध्‍वस्‍त हुई हैं।

दूसरी तरफ, सूरजकुंड स्थित अरावली की पहाड़ियों में बसे गांव खोरी से बेघर हो रही करीब 60 हजार की आबादी का सवाल है। हरित क्षेत्र में आने के चलते उच्‍चतम न्‍यायालय ने यहां बसे लोगों को हटाने का फरमान जारी कर दिया है। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर लोगों का कहना है कि वह अपने घरों को खाली करने के लिए तैयार हैं, लेकिन उससे पहले सरकार उनके रहने की व्यवस्था तो करे। उन्हें दूसरी जगह बसाया जाए। लोग भू-माफिया को भी दंडित करने की मांग कर रहे हैं, जिसकी वजह से उन्‍हें आज यह दिन देखने पड़ रहे हैं। करीब 30 साल पहले लोगों की यहां बसावट शुरू हुई। दिल्ली और फरीदाबाद सीमा में बसे लोगों ने बिल्डरों के झांसे में आकर यहां अपना आशियाना बनाया। स्थानीय लोगों का कहना है कि शुरुआत में बिल्डरों ने उन्हें बिजली- पानी देने का आश्वासन दिया। खोरी में बने करीब 15 हजार मकानों में 60 हजार लोग रहते हैं। लोगों का कहना है कि वर्ष 2011 तक लोगों ने यहां खूब जमीन खरीदी। दो-दो, तीन-तीन मंजिल के मकान बना लिए। यहां पांचवीं तक एक सरकारी स्कूल भी चल रहा है। लोगों के वोटर कार्ड सहित सभी जरूरी कागजात बने हुए है। गलियां पक्की हैं। बिजली और पानी की सुविधा दी जा रही है इसके बावजूद अब इनके यहां से उजड़ने की नौबत आ गई है। लोगों का कहना है कि एक तरफ सरकार वर्ष 2023 तक सबको पक्का मकान देने की बात करती है। दूसरी तरफ उनके मकानों को तोड़ जा रहा है। तोड़फोड़ की कार्रवाई से पहले सरकार उन्हें दूसरी जगह मकान, जमीन और मुआवजा दे। उसके बाद ही उनके आशियाने को उजाड़ा जाए। कैबिनेट मंत्री मूलचंद शर्मा ने इन लोगों की गुहार के बाद आश्‍वासन भी दिया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हजारों लोग प्रभावित होंगे, ऐसे में यह देखना होगा कि लोगों के लिए सरकार किस तरह से राहत भरे कदम उठा सकती है। मौजूदा समय में कितने लोग सरकारी योजना के तहत लाभ ले रहे हैं, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है। सोनीपत के गोहाना से विधायक जगबीर सिंह मलिक का कहना है कि यह सरकार की जिम्‍मेदारी है कि वह लोगों का पुनर्वास करे। यही तो सरकार का काम होता है। बेशक, सरकार बेघर हो रहे लोगों को अस्‍थाई निवास ही तात्‍कालिक तौर पर उपलब्‍ध करवाए। वहीं, जगबीर मलिक का कहना है कि कोरोना पर कैबिनेट बैठक में चर्चा भी न होना इस सरकार की त्रासदी है। अगर इस वक्‍त भी सरकार का यह रवैया है तो उस पर गंभीर सवाल है। उनका कहना कि सरकारी आंकड़ों में दर्ज कोरोना से मौतें तो गिनती की हैं। असल संख्‍या तो सरकार के रिकॉर्ड से बाहर है। गांव-गांव में हुई कोरोना से मौतें यदि सरकार अपने रिकॉर्ड में नहीं लाती है तो कैसे वह उन बच्‍चों की मदद करेगी, जो अनाथ हो गए हैं। सरकार को मंत्रिमंडल की बैठक में विचार कर कोई पहल करनी चाहिए थी। फरीदाबाद से विधायक नीरज शर्मा का कहना है कि यह सरकार तो गूंगी-बहरी सरकार है। इससे क्‍या उम्‍मीद करें। इस वक्‍त भी मंत्रिमंडल यदि कोरोना पर कोई चर्चा नहीं करता है तो इससे ज्‍यादा गंभीर बात क्‍या हो सकती है। वहीं, बेघर हो रहे खोरी गांव के हरियाणा के बांशिंदों के पुनर्वास की जिम्‍मेदारी वह राज्‍य सरकार की मानते हैं, जबकि दिल्‍ली के तहत आते हिस्‍से की जिम्‍मेदारी दिल्‍ली सरकार की। नीरज शर्मा का कहना है कि सरकार का ऐसा न करना अंसवेदनशीलता का परिचायक है। होना तो यह चाहिए कि दिल्‍ली और हरियाणा सरकारें इस पर बैठकर फैसला करें।

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